हिन्दी साहित्य को सम्मानित करने की कोशिश में एक छोटा सा प्रयास, हिन्दी की श्रेठ कविताओं, ग़ज़लों, कहानियों एवं अन्य लेखों को एक स्थान पर संकलित करने की छोटी सी कोशिश...

Vikram-Betaal / Betaal Pacchisi - 01 Story - Paapi Kaun? | विक्रम-बैताल / बैताल पच्चीसी - 01 कहानी - ​पापी कौन ?

काशी में प्रतापमुकुट नाम का राजा राज्य करता था। उसके वज्रमुकुट नाम का एक बेटा था। एक दिन राजकुमार दीवान के लड़के को साथ लेकर शिकार खेलने जंगल गया। घूमते-घूमते उन्हें तालाब मिला। उसके पानी में कमल खिले थे और हंस किलोल कर रहे थे। किनारों पर घने पेड़ थे, जिन पर पक्षी चहचहा रहे थे। दोनों मित्र वहाँ रुक गये और तालाब के पानी में हाथ-मुँह धोकर ऊपर महादेव के मन्दिर पर गये। घोड़ों को उन्होंने मन्दिर के बाहर बाँध दिया। वो मन्दिर में दर्शन करके बाहर आये तो देखते क्या हैं कि तालाब के किनारे राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ स्नान करने आई है। दीवान का लड़का तो वहीं एक पेड़ के नीचे बैठा रहा, पर राजकुमार से न रहा गया। वह आगे बढ़ गया। राजकुमारी ने उसकी ओर देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। राजकुमारी भी उसकी तरफ़ देखती रही। फिर उसने किया क्या कि जूड़े में से कमल का फूल निकाला, कान से लगाया, दाँत से कुतरा, पैर के नीचे दबाया और फिर छाती से लगा, अपनी सखियों के साथ चली गयी।

Vikram Aur Betaal / Betaal Pacchisi - 00 Initial Story | विक्रम बैताल / बैताल पच्चीसी - 00 प्रारम्भ की कहानी

बहुत पुरानी बात है। धारा नगरी में गंधर्वसेन नाम का एक राजा राज करते थे। उसके चार रानियाँ थीं। उनके छ: लड़के थे जो सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे। संयोग से एक दिन राजा की मृत्यु हो गई और उनकी जगह उनका बड़ा बेटा शंख गद्दी पर बैठा। उसने कुछ दिन राज किया, लेकिन छोटे भाई विक्रम ने उसे मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता गया और वह सारे जम्बूद्वीप का राजा बन बैठा। एक दिन उसके मन में आया कि उसे घूमकर सैर करनी चाहिए और जिन देशों के नाम उसने सुने हैं, उन्हें देखना चाहिए। सो वह गद्दी अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर, योगी बन कर, राज्य से निकल पड़ा।

Dushyant Kumar - Ek Gudiya Ki Kai Kathpuliyo Mein Jaan Hai | दुष्यंत कुमार - एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है

Saadat Hasan Manto - Savere Jo Kal Aankh Meri Khuli | सआदत हसन मंटो - सवेरे जो कल आँख मेरी खुली

अज़ब थी बहार और अज़ब सैर थी! यही जी में आया कि घर से निकल टहलता-टहलता ज़रा बाग़ चल। बाग़ में पहुँचने से पहले ज़ाहिर है कि मैंने कुछ बाज़ार और गलियाँ तय की होंगी और मेरी आँख ने कुछ देखा भी होगा। पाकिस्तान पहले का देखा-भाला था। लेकिन, जब से ‘ज़िंदाबाद’ हुआ, वह कल देखा। बिजली खंभे पर देखा, परनाले पर देखा, छज्जे पर देखा, हर जगह देखा; जहाँ न देखा, वहाँ देखने की हसरत लिए घर लौटा।

Firaq Gorakhpuri - Jo Baat Hai Hadd Se Badh Gayi Hai | फ़िराक़ गोरखपुरी - जो बात है हद से बढ़ गयी है | Ghazal

जो बात है हद से बढ़ गयी है
वाएज़(1) के भी कितनी चढ़ गई है

हम तो ये कहेंगे तेरी शोख़ी
दबने से कुछ और बढ़ गई है

हर शय ब-नसीमे-लम्से-नाज़ुक(2)
बर्गे-गुले-तर से बढ़ गयी है

जब-जब वो नज़र उठी मेरे सर
लाखों इल्ज़ाम मढ़ गयी है

Hullad Muradabadi - Mashkhara Mashoor Hai Aansoo Bahane Ke Liye | हुल्लड़ मुरादाबादी - मसखरा मशहूर है आँसू बहाने के लिए | Ghazal

मसखरा मशहूर है, आँसू बहानेके लिए
बाँटता है वो हँसी, सारे ज़माने के लिए

घाव सबको मत दिखाओ, लोग छिड़केंगे नमक
आएगा कोई नहीं मरहम लगाने के लिए

देखकर तेरी तरक्की, ख़ुश नहीं होगा कोई
लोग मौक़ा ढूँढते हैं, काट खाने के लिए

फलसफ़ा कोई नहीं है, और न मकसद कोई
लोग कुछ आते जहाँ में, हिनहिनाने के लिए

मिल रहा था भीख में, सिक्का मुझे सम्मान का
मैं नहीं तैयार झुककर उठाने के लिए

ज़िंदगी में ग़म बहुत हैं, हर कदम पर हादसे रोज
कुछ समय तो निकालो, मुस्कुराने के लिए

Jaun Elia - Ajab Tha Uski Dilzari Ka Andaz | जॉन एलिया - अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़ | Ghazal

"जॉन एलिया - अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़" हिंदी लिपि में 


अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़, वो बरसों बाद जब मुझ से मिला है
भला मैं पूछता उससे तो कैसे, मताए-जां तुम्हारा नाम क्या है?

साल-हा-साल और एक लम्हा, कोई भी तो न इनमें बल आया
खुद ही एक दर पे मैंने दस्तक दी, खुद ही लड़का सा मैं निकल आया

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